गले लगा लो प्यार से, खींचो मेरे कान
तुम ने मेरा दुःख सुना, तुम मेरे भगवान
सुन्दर सपना देखते, बीती सारी रात
सुबः चिड़िया उड़ गयी, याद न आई बात
दूर देस परदेस में, लोग मिले अनजान
दुःख सुख बांटा चल दिए, फिर रस्ता सुनसान
धूप के पाँव थक गए, जा चढ़ बैठी नीम
बैठी बैठी सो रही, टेक लगाये जीम
मैं उलझा था आप में, उस ने खींची डोर
उस के मन में जा बसा, मेरे मन का चोर
सब जग सोता पड़ गया, इक मैं जागूं रैन
सूने तन में गूंजता, गूंगे मन का बैन
हम को जिसकी खोज थी, उसका पता ना था
और वो हम को खोजता, उस को पता ना था
अबस रेत को सींचता, निचुड़ निचुड़ आकास
छुआ छूत का रोग है, प्यास जन्मती प्यास
मन बिरले बैराग की, कैसी पकड़ी राह
जिससे चाहे छूटना, उसको भर ले बांह
जिस को जिस से नेह था, उस को वही अज़ाब
वाइज़ मैकश हो गया, हम से छुटि शराब
मैख़ाने के द्वार पर, रिंदा निरूउपाए
सौगंध ऊपर लालसा, जी से हूक उठाये
सूखी सूखी नींद पर, गीली गीली ओस
शब भर छत पर चाँद ने, खूब किया अफ़सोस
तुम ने मेरा दुःख सुना, तुम मेरे भगवान
सुन्दर सपना देखते, बीती सारी रात
सुबः चिड़िया उड़ गयी, याद न आई बात
दूर देस परदेस में, लोग मिले अनजान
दुःख सुख बांटा चल दिए, फिर रस्ता सुनसान
धूप के पाँव थक गए, जा चढ़ बैठी नीम
बैठी बैठी सो रही, टेक लगाये जीम
मैं उलझा था आप में, उस ने खींची डोर
उस के मन में जा बसा, मेरे मन का चोर
सब जग सोता पड़ गया, इक मैं जागूं रैन
सूने तन में गूंजता, गूंगे मन का बैन
हम को जिसकी खोज थी, उसका पता ना था
और वो हम को खोजता, उस को पता ना था
अबस रेत को सींचता, निचुड़ निचुड़ आकास
छुआ छूत का रोग है, प्यास जन्मती प्यास
मन बिरले बैराग की, कैसी पकड़ी राह
जिससे चाहे छूटना, उसको भर ले बांह
जिस को जिस से नेह था, उस को वही अज़ाब
वाइज़ मैकश हो गया, हम से छुटि शराब
मैख़ाने के द्वार पर, रिंदा निरूउपाए
सौगंध ऊपर लालसा, जी से हूक उठाये
सूखी सूखी नींद पर, गीली गीली ओस
शब भर छत पर चाँद ने, खूब किया अफ़सोस
No comments:
Post a Comment